Legal Protection to Working Women | Legal Consultancy

Indu Bajaj
Legal

28 Nov 2020
Legal Protection to Working Women | Legal Consultancy

आज काम करने वाली हर स्त्री कितनी सुरक्षित है, यह हम सब जानते है| स्त्रियों की सुरक्षा तथा उन्हें आगे बढानें, हर क्षेत्र में समान दर्जा तथा भागीदारी देने के दावों में कितनी सचाई है यह भी सब जानते है| आज कल हर क्षेत्रों में स्त्रियों की भागीदारी बढती जा रही है| चाहे यह उनकी पढाई_लिखाई या योग्यता का परिणाम हो या प्रगतिशीलता का या फिर परिवार की जरूरत या मज़बूरी का| स्त्रियों ने प्रत्येक क्षेत्र में अपनी पहुँच बनाकर अपनी आमद कायम करायी है| लेकिन इसके साथ ही यह भी सच्चाई है की स्त्रियों के बाहरी कार्यक्षत्रों में बढती भागीदारी के साथ ही उनके शोषण तथा यौन शोषण व यौन उत्पीड़न की घटनाओं में भी भरी बढोत्तरी हो रही है|

काम करने वाली स्त्रियों के इस शोषण को रोकने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने ‘विशाखा व अन्य बनाम स्टेट ऑफ़ राजस्थान व अन्य’ के मामले में निर्णय देते हुए विशेष दिशा-निर्देश जारी किए है| ऐसा नहीं है की सिर्फ काम करने वाली स्त्रियां ही यौन शोषण का शिकार हो रही है, बल्कि अन्य स्त्रियां भी बलात्कार, छेदछाड़ तथा घरेलू झगड़ों का शिकार होती है| स्त्रियों की सुरक्षा को मध्य नज़र रखते हुए, सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ महत्वपूर्ण निर्देश ज़ारी किए|

जब राजस्थान की एक स्वयंसेवा संस्था “विशाखा” ने जब एक स्त्री के साथ सामूहिक बलात्कार होने पर, घर से बाहर जाने वाली हर स्त्री के लिए कुछ निर्देश जारी करने की याचिका दर्ज की| इस याचिका पर ऐतिहासिक निर्णय देते हुए सर्वोच्च नयायालय ने अपने निर्णय में कहा कि यह दुःख की बात है कि बाहरी कार्यक्षेत्र में काम करने वाली स्त्रियों के यौन शोषण को प्रभावी रूप से रोकने के लिए हमारे कानून में समुचित प्रावधान नहीं है| इस निर्णय में प्रथम बार सर्वोच्च न्यायालय ने “यौन शौषण” को परिभाषित किया| किसी बी स्त्री को शारीरिक रूप से छेड़ा जाता है, उसके समक्ष यौन संबंधी भद्दे वाक्य कहे जाते है, उसको अश्लील साहित्य दिखाया जाता है या किसी प्रकार का अन्य अशिष्ट व्यवहार किया जाता है, तो वह यौन शोषण के दायरे में माना जायेगा|

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि किसी भी कामकाजी स्त्री का यौन शोषण रोकना, उसको नौकरी प्रदान करने वाले व्यक्ति तथा या संस्थान का कर्तव्य है| न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा की सभी नौकरी प्रदान करने वाले व्यक्ति या संस्थान का कर्तव्य है| न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि सभी नौकरी प्रदान करने वाले व्यक्ति या संस्थान चाहे वह सरकारी हों या निजी, का कर्तव्य है की वह कामकाजी स्त्रियों का यौन शोषण रोकने हेतु सभी उपयुक्त उपाय करेंगे| न्यायालय ने कहा की उक्त संस्थान या व्यक्ति इस कर्त्तव्य को पूरा करने हेतु निम्न कार्य आवश्यक रूप से करेंगे-

  • कामकाजी स्त्रियों के कार्यस्थल पर यौन शोषण रोकने के लिए उपायों को प्रचार-प्रसार के माध्यमों से उपर्युक्त रूप से प्रचारित करेंगे|

  • सरकारी तथा सार्वजानिक संस्थानों में आचरण संबंधी नियमों/प्रावधानों में यौन शोषण को वर्जित घोषित किया जायेगा तथा उक्त आचरण का उल्लंघन करने वालों को उपयुक्त रूप से सज़ा दी जाएगी|

  • जहाँ तक निजी संस्थानों का संबंध है, यह उक्त निषेध कार्यक्रम को इंडस्ट्रियल एम्प्लोइमेंट (स्टैंडिंग आर्डर) एक्ट, 1946 में शामिल करेंगे|

  • कामकाजी स्त्रियों के कार्यस्थल को सही रूप से उपयुक्त कार्यस्थल बनाया जायेगा तथा किसी भी कामकाजी स्त्री को कि जहाँ तक उसकी नौकरी का सवाल है, उसके साथ कोई अनुचित कार्य हो रहा है|

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में आगे कहा कि यदि किसी कामकाजी स्त्री के साथ भारतीय दण्ड संहिता के अनुसार कोई भी कार्य किया गया हो, तो यह उसके नियोक्ता या संस्थान का कर्तव्य है कि वह उचित अधिकारी के समक्ष स्वयं शिकायत दर्ज करें| इस बात का अवश्य ध्यान रखा जाए की किसी भी पीड़ित महिला या उसके किसी भी गवाह की किसी रूप में प्रताड़ित या डराया नहीं जाए| न्यायालय ने कहा कि यौन-शोषण से पीड़ित को यह अधिकार दिया जाए कि स्वयं की इच्छा से अपना स्थानान्तरण करवा सके|

पीड़ित महिला की सुनवाई हेतु एक शिकायत कमेटी का गठन किया जाए, जिसके माध्यम से स्त्री अपनी शिकायत का निवारण कर सके| साथ ही शिकायत के निवारण हेतु प्रक्रिया समयबद्ध भी हो| उक्त शिकायत कमेटी की अध्यक्ष एक स्त्री होनी चाहिए| साथ ही इस कमेटी के ऊपर किसी भी प्रकार के बाहरी दबाव को रोकने के लिए बेहतर होगा कि किसी ग़ैर-सरकारी स्वयंसेवी संस्थान यौन-शौषण जैसे मामलों के निदान हेतु एक्सपर्ट हो| सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि यह शिकायत कमेटी हर वर्ष एक रिपोर्ट जारी करेगी जिसमें शिकायतों तथा उनके निदान का विस्तृत ब्यौरा होगा|कमेटी यह रिपोर्ट सरकारी विभाग के समक्ष प्रस्तुत करेगी| साथ ही नियोक्ता तथा संस्थान, न्यायालय द्वारा जारी इन निर्देशों के पालन हेतु अपनी रिपोर्ट भी सरकारी विभाग के समक्ष प्रस्तुत करेगा|

सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि उक्त निर्देशों के अलावा सभी कामकाजी स्त्रियों को मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम-1993 के अन्तर्गत प्राप्त सभी अधिकार भी प्राप्त हैं, तथा इन अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में उपयुक्त कानूनी प्रक्रिया अपना सकती है, सथ की सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र तथा राज्य सरकारों से आग्रह किया कि वह शिघ्र ही इन निर्देशों को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त कानून का पालन करें| सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में यह स्पष्ट रूप से कहा कि इन निर्देशों का पालन बहुत सख्ती से किया जाए|

किसी भी प्रकार की कानूनी सलाह एवं राय के लिए हमारे लीगल कंसलटेंट (Legal Consultant) से बेझिझक www.myfitbrain.in पर ऑनलाइन संपर्क करें|

आज काम करने वाली हर स्त्री कितनी सुरक्षित है, यह हम सब जानते है| स्त्रियों की सुरक्षा तथा उन्हें आगे बढानें, हर क्षेत्र में समान दर्जा तथा भागीदारी देने के दावों में कितनी सचाई है यह भी सब जानते है| आज कल हर क्षेत्रों में स्त्रियों की भागीदारी बढती जा रही है| चाहे यह उनकी पढाई_लिखाई या योग्यता का परिणाम हो या प्रगतिशीलता का या फिर परिवार की जरूरत या मज़बूरी का| स्त्रियों ने प्रत्येक क्षेत्र में अपनी पहुँच बनाकर अपनी आमद कायम करायी है| लेकिन इसके साथ ही यह भी सच्चाई है की स्त्रियों के बाहरी कार्यक्षत्रों में बढती भागीदारी के साथ ही उनके शोषण तथा यौन शोषण व यौन उत्पीड़न की घटनाओं में भी भरी बढोत्तरी हो रही है|

काम करने वाली स्त्रियों के इस शोषण को रोकने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने ‘विशाखा व अन्य बनाम स्टेट ऑफ़ राजस्थान व अन्य’ के मामले में निर्णय देते हुए विशेष दिशा-निर्देश जारी किए है| ऐसा नहीं है की सिर्फ काम करने वाली स्त्रियां ही यौन शोषण का शिकार हो रही है, बल्कि अन्य स्त्रियां भी बलात्कार, छेदछाड़ तथा घरेलू झगड़ों का शिकार होती है| स्त्रियों की सुरक्षा को मध्य नज़र रखते हुए, सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ महत्वपूर्ण निर्देश ज़ारी किए|

जब राजस्थान की एक स्वयंसेवा संस्था “विशाखा” ने जब एक स्त्री के साथ सामूहिक बलात्कार होने पर, घर से बाहर जाने वाली हर स्त्री के लिए कुछ निर्देश जारी करने की याचिका दर्ज की| इस याचिका पर ऐतिहासिक निर्णय देते हुए सर्वोच्च नयायालय ने अपने निर्णय में कहा कि यह दुःख की बात है कि बाहरी कार्यक्षेत्र में काम करने वाली स्त्रियों के यौन शोषण को प्रभावी रूप से रोकने के लिए हमारे कानून में समुचित प्रावधान नहीं है| इस निर्णय में प्रथम बार सर्वोच्च न्यायालय ने “यौन शौषण” को परिभाषित किया| किसी बी स्त्री को शारीरिक रूप से छेड़ा जाता है, उसके समक्ष यौन संबंधी भद्दे वाक्य कहे जाते है, उसको अश्लील साहित्य दिखाया जाता है या किसी प्रकार का अन्य अशिष्ट व्यवहार किया जाता है, तो वह यौन शोषण के दायरे में माना जायेगा|

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि किसी भी कामकाजी स्त्री का यौन शोषण रोकना, उसको नौकरी प्रदान करने वाले व्यक्ति तथा या संस्थान का कर्तव्य है| न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा की सभी नौकरी प्रदान करने वाले व्यक्ति या संस्थान का कर्तव्य है| न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि सभी नौकरी प्रदान करने वाले व्यक्ति या संस्थान चाहे वह सरकारी हों या निजी, का कर्तव्य है की वह कामकाजी स्त्रियों का यौन शोषण रोकने हेतु सभी उपयुक्त उपाय करेंगे| न्यायालय ने कहा की उक्त संस्थान या व्यक्ति इस कर्त्तव्य को पूरा करने हेतु निम्न कार्य आवश्यक रूप से करेंगे-

  • कामकाजी स्त्रियों के कार्यस्थल पर यौन शोषण रोकने के लिए उपायों को प्रचार-प्रसार के माध्यमों से उपर्युक्त रूप से प्रचारित करेंगे|

  • सरकारी तथा सार्वजानिक संस्थानों में आचरण संबंधी नियमों/प्रावधानों में यौन शोषण को वर्जित घोषित किया जायेगा तथा उक्त आचरण का उल्लंघन करने वालों को उपयुक्त रूप से सज़ा दी जाएगी|

  • जहाँ तक निजी संस्थानों का संबंध है, यह उक्त निषेध कार्यक्रम को इंडस्ट्रियल एम्प्लोइमेंट (स्टैंडिंग आर्डर) एक्ट, 1946 में शामिल करेंगे|

  • कामकाजी स्त्रियों के कार्यस्थल को सही रूप से उपयुक्त कार्यस्थल बनाया जायेगा तथा किसी भी कामकाजी स्त्री को कि जहाँ तक उसकी नौकरी का सवाल है, उसके साथ कोई अनुचित कार्य हो रहा है|

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में आगे कहा कि यदि किसी कामकाजी स्त्री के साथ भारतीय दण्ड संहिता के अनुसार कोई भी कार्य किया गया हो, तो यह उसके नियोक्ता या संस्थान का कर्तव्य है कि वह उचित अधिकारी के समक्ष स्वयं शिकायत दर्ज करें| इस बात का अवश्य ध्यान रखा जाए की किसी भी पीड़ित महिला या उसके किसी भी गवाह की किसी रूप में प्रताड़ित या डराया नहीं जाए| न्यायालय ने कहा कि यौन-शोषण से पीड़ित को यह अधिकार दिया जाए कि स्वयं की इच्छा से अपना स्थानान्तरण करवा सके|

पीड़ित महिला की सुनवाई हेतु एक शिकायत कमेटी का गठन किया जाए, जिसके माध्यम से स्त्री अपनी शिकायत का निवारण कर सके| साथ ही शिकायत के निवारण हेतु प्रक्रिया समयबद्ध भी हो| उक्त शिकायत कमेटी की अध्यक्ष एक स्त्री होनी चाहिए| साथ ही इस कमेटी के ऊपर किसी भी प्रकार के बाहरी दबाव को रोकने के लिए बेहतर होगा कि किसी ग़ैर-सरकारी स्वयंसेवी संस्थान यौन-शौषण जैसे मामलों के निदान हेतु एक्सपर्ट हो| सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि यह शिकायत कमेटी हर वर्ष एक रिपोर्ट जारी करेगी जिसमें शिकायतों तथा उनके निदान का विस्तृत ब्यौरा होगा|कमेटी यह रिपोर्ट सरकारी विभाग के समक्ष प्रस्तुत करेगी| साथ ही नियोक्ता तथा संस्थान, न्यायालय द्वारा जारी इन निर्देशों के पालन हेतु अपनी रिपोर्ट भी सरकारी विभाग के समक्ष प्रस्तुत करेगा|

सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि उक्त निर्देशों के अलावा सभी कामकाजी स्त्रियों को मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम-1993 के अन्तर्गत प्राप्त सभी अधिकार भी प्राप्त हैं, तथा इन अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में उपयुक्त कानूनी प्रक्रिया अपना सकती है, सथ की सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र तथा राज्य सरकारों से आग्रह किया कि वह शिघ्र ही इन निर्देशों को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त कानून का पालन करें| सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में यह स्पष्ट रूप से कहा कि इन निर्देशों का पालन बहुत सख्ती से किया जाए|

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    Language: English, Hindi

    Area Of Expertise: Eating Disorders, Domestic Violence, TeenAge Problems, Child Education

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